हर सुबह घर से निकलते वक्त अगर आपके मन में यह सवाल आता है कि “आज जाम कितना मिलेगा?”—तो आप अकेले नहीं हैं।
दुनिया भर के करोड़ों लोग अब अपने दिन की प्लानिंग ट्रैफिक को देखकर करने लगे हैं।
अब TomTom Traffic Index की Traffic Index 2025 रिपोर्ट सामने आई है, जो 400 से ज्यादा शहरों के रियल-टाइम ट्रैफिक डेटा के आधार पर तैयार की गई है।
यह वही रिपोर्ट है, जिसे दुनियाभर में सरकारें और शहरी प्लानिंग एजेंसियां रेफरेंस के तौर पर इस्तेमाल करती हैं।
इस रिपोर्ट में दुनिया के सबसे ज्यादा ट्रैफिक-जाम वाले शहरों की लिस्ट जारी की गई है—और इसमें भारत के कई बड़े शहर भी शामिल हैं।
TomTom Traffic Index क्या है और इसे क्यों गंभीरता से लिया जाता है?
TomTom Traffic Index सिर्फ एक रैंकिंग नहीं, बल्कि यह दिखाने की कोशिश है कि ट्रैफिक अब शहरों की लाइफ क्वालिटी को कैसे प्रभावित कर रहा है।
इस रिपोर्ट में इन बातों का विश्लेषण किया जाता है:
- औसत ट्रैवल टाइम
- पीक ऑवर्स में स्पीड
- 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में लगने वाला समय
- सालभर में ट्रैफिक की वजह से बर्बाद हुए घंटे
इसी वजह से इसे पॉलिसी-मेकिंग और अर्बन मोबिलिटी प्लानिंग में अहम माना जाता है।
2025 की रिपोर्ट: ग्लोबल लेवल पर ट्रैफिक कितना बिगड़ा?
Traffic Index 2025 के मुताबिक:
- दुनिया के कई बड़े शहरों में औसत ट्रैफिक स्पीड 15 km/h से नीचे पहुंच चुकी है
- कई शहरों में 10 किमी की दूरी तय करने में 35–40 मिनट लग रहे हैं
- एक आम शहरी कम्यूटर साल में 150 से 170 घंटे सिर्फ ट्रैफिक में बिता देता है
यह समय लगभग 6–7 पूरे दिनों के बराबर है, जो हर साल सिर्फ जाम में निकल जाता है।
भारत के शहर: रिपोर्ट में क्या तस्वीर सामने आई?
भारत के लिए यह रिपोर्ट खास तौर पर अहम है, क्योंकि यहां तेजी से बढ़ती कार ओनरशिप और सीमित रोड इंफ्रास्ट्रक्चर इस समस्या को और गहरा कर रहे हैं।
रिपोर्ट में शामिल कुछ भारतीय शहर:
- बेंगलुरु: दुनिया के सबसे ज्यादा ट्रैफिक-जाम वाले शहरों में टॉप-2
- 10 किमी की दूरी तय करने में औसतन 36 मिनट
- पुणे: ग्लोबल टॉप-5 में
- सालाना 150+ घंटे ट्रैफिक में बर्बाद
- मुंबई: दुनिया के टॉप-10 के आसपास
- दिल्ली और कोलकाता: टॉप-20 के भीतर
इन शहरों में पीक ऑवर्स के दौरान औसत स्पीड अक्सर 14–18 km/h तक सिमट जाती है।

आपकी सिटी भी इस लिस्ट में क्यों आ सकती है?
यह जरूरी नहीं कि सिर्फ मेट्रो शहर ही ट्रैफिक संकट से जूझ रहे हों।
आज टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी ट्रैफिक जाम रोज़मर्रा की समस्या बनता जा रहा है।
इसके पीछे आम वजहें:
- ऑफिस, स्कूल और कॉलेज का एकसाथ टाइम
- पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर जरूरत से ज्यादा दबाव
- सीमित सड़कों पर तेज़ी से बढ़ती गाड़ियों की संख्या
- मेट्रो, फ्लाईओवर और रोडवर्क्स का लंबा चलना
- पार्किंग और ट्रैफिक मैनेजमेंट की कमी
यही वजह है कि कई शहर अचानक ट्रैफिक रैंकिंग में ऊपर आ जाते हैं।
आम लोगों की जिंदगी पर इसका क्या असर पड़ रहा है?
ट्रैफिक अब सिर्फ देर से पहुंचने की परेशानी नहीं रह गया।
रोज़मर्रा की हकीकत:
- दिन के 2–3 घंटे सिर्फ आने-जाने में
- फ्यूल खर्च और वाहन मेंटेनेंस पर ज्यादा पैसा
- मानसिक तनाव, थकान और चिड़चिड़ापन
- परिवार और पर्सनल टाइम में कटौती
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ट्रैफिक की वजह से हर साल हजारों करोड़ रुपये की प्रोडक्टिविटी बर्बाद हो जाती है।

क्या यह सिर्फ भारत की समस्या है?
नहीं।
Traffic Index 2025 साफ दिखाता है कि ट्रैफिक अब एक ग्लोबल अर्बन क्राइसिस बन चुका है।
- यूरोप के कई शहरों में औसत स्पीड 12–14 km/h
- एशिया के तेजी से बढ़ते शहर सबसे ज्यादा प्रभावित
- लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पीछे छूट रहा है
मतलब साफ है—शहर बढ़ रहे हैं, लेकिन प्लानिंग उतनी तेजी से नहीं।
क्यों अहम है यह रिपोर्ट अभी?
वर्क-फ्रॉम-ऑफिस की वापसी, बढ़ती EV बिक्री और मेट्रो प्रोजेक्ट्स के बीच यह डेटा बताता है कि हमारे शहर किस दिशा में जा रहे हैं।
यह रिपोर्ट आने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर फैसलों के लिए रियलिटी-चेक की तरह है।
क्या सिर्फ सड़कें और फ्लाईओवर बनाना काफी है?
अर्बन प्लानिंग एक्सपर्ट्स मानते हैं कि:
- ❌ सिर्फ सड़कें बढ़ाने से स्थायी समाधान नहीं मिलता
- ✅ मजबूत पब्लिक ट्रांसपोर्ट जरूरी है
- ✅ ऑफिस टाइम का डाइवर्सिफिकेशन जरूरी है
- ✅ वर्क-फ्रॉम-होम और हाइब्रिड मॉडल मदद कर सकते हैं
- ✅ स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम जरूरी हैं
कुछ शहर इन पर काम कर रहे हैं, लेकिन असर दिखने में वक्त लगेगा।
AutoNewsWala Verdict
यह रिपोर्ट दिखाती है कि ट्रैफिक अब रोज़ की परेशानी नहीं, बल्कि शहरों के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।
अगर आप रोज़ जाम में फंसते हैं, तो मुमकिन है—आपका शहर भी इस लिस्ट में हो या जल्द शामिल हो जाए।
नोट: यह लेख TomTom Traffic Index 2025 और वैश्विक शहरी ट्रैफिक डेटा पर आधारित है।

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